प्रमुख रोग व निवारण : Diseases and revention

दिए हुए आर्टिकल में विभिन्न रोगों के बारे में जानकारी दी गई है तथा उनके लक्षण व उपचार के बारे में भी बताया गया है.

1.डिप्रेशन (लम्बी उदासी)

सामान्यतया सभी व्यक्ति विछोह अथवा हानि से उदास या दुखी हो जाते हैं जैसे सगे-संबंधी की मृत्यु के पश्चात्, कर्जा, कोई आर्थिक हानि होने पर, नौकरी न मिलने के कारण, चलता व्यापार बंद हो जाना या परीक्षा में असफल हो जाने के कारण, बीमारी, मृत्यु या अन्य कोई भय, पारिवारिक वातावरण इत्यादि। परन्तु यह उदासीनता परिस्थिति के अनुसार ही होती है और समय के साथ-साथ धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। यदि यह उदासी बहुत समय तक बनी रहे तथा व्यक्ति के कार्यों एवं पारिवारिक जीवन को प्रभावित करने लगे तब इसको डिप्रेशन कहते हैं।

कुछ व्यक्तियों में विटामिंस की कमी या अन्य दूसरे रोग जैसे थायराइड हारमोंस, बढ़ी हुई शुगर, नींद की कमी, दवाई का असर, नशा से भी डिप्रेशन की स्थिति बन सकती है परन्तु कभी-कभी मस्तिष्क के कुछ रसायन की कमी भी डिप्रेशन का कारण होती है।

डिप्रेशन रोग के प्रमुख लक्षण

डिप्रेशन में व्यक्ति हमेशा उदास और निराश अनुभव करता है। वह अपने भविष्य के बारे में उत्साहहीन हो जाता है, हँसना भी भूल जाता है। उसे बार-बार रुलाई आने लगती है। कई बार रोगी अपने आपको और अपने जीवन को भार समझने लगता है जिसके फलस्वरूप उसमें आत्महत्या की प्रवृत्ति भी कभी-कभी उत्पन्न हो जाती है। इन्हें किसी से मिलना जुलना पसन्द नहीं रहता, किसी भी काम में मन नहीं लगता या बार-बार गलतियाँ होना और इनकी खाने पीने एवं मनोरंजन की भी इच्छा कम हो जाती है। इस रोग में बहुधा व्यक्ति अपने आपको बिलकुल बेकार, असहाय तथा कभी-कभी अपने को अपराधी भी समझने लगता है। कुछ रोगी तो यहाँ तक निराश हो जाते हैं कि ऐसा सोचने लगते हैं कि जो कुछ भी उनके परिवार में बुरा हो रहा है वह उनके ही कारण है। उन्हें नित्य के छोटे-छोटे काम करना भी भारी लगने लगता है जैसे – नहाना, कपड़े साफ करना या खाना बनाना आदि। उनकी नींद कम हो जाती है। परिस्थिति जन्य डिप्रेशन में रात को देर से नींद आती है और अकारण डिप्रेशन में सुबह नींद जल्दी टूट जाती है। इसके अतिरिक्त भूख कम हो जाती है तथा वजन घट जाता है। उनकी सभी इच्छायें कम हो जाती हैं और थकान की भावना बनी रहती है। चाल भी सुस्त हो जाती है, शरीर के किसी भी भाग में दर्द अथवा कमजोरी महसूस हो सकती है। रोगी कई बार इतना निराश हो जाता है कि वे चिकित्सा नहीं कराना चाहते क्योंकि वह यह समझने लगते हैं कि चिकित्सा में किया गया व्यय भी व्यर्थ होगा। उन्हें अपने ठीक होने की सम्भावना नहीं लगती।

उपरोक्त सभी लक्षण हर रोगी में नहीं पाये जाते हैं। अगर डिप्रेशन हल्का होता है तो लक्षणों की तीव्रता कम होती है और रोगी केवल अपने आप में उदासी महसूस करता है। यदि डिप्रेशन तीव्र होता है तो उपरोक्त लक्षण अधिकतर पाये जाते हैं तथा अत्याधिक डिप्रेशन होने पर रोगी खाना-पीना छोड़ देता है और बुत की तरह हो जाता है और उसी तरह चाल भी धीमी हो जाती है।

डिप्रेशन के रोग वंशानुगत भी हो सकते हैं और स्वतः ठीक भी हो सकते हैं फिर भी मनोचिकित्सक से सलाह लेना ही उचित है।

2.मेनिया (अति उत्साह)

कुछ रोगियों में मस्तिष्क के कुछ रसायन बढ़ जाते हैं | तब डिप्रेशन की विपरीत स्थिति पैदा होती है जिसे मेनिया कहते हैं।

मेनिया के मुख्य लक्षण निम्न हैं

इसमें रोगी अत्याधिक प्रसन्न व उत्साही हो जाता है। उनके दिमाग में नई-नई योजनायें बनती रहती हैं और बहुत जल्दी एक बड़ा अमीर बनने का प्रयास करने लगते है। विचारों की तेजी के कारण वह विभिन्न प्रकार के नये र .काम करना प्रारम्भ कर देता है किन्तु किसी भी काम को ठीक ढंग से सम्पन्न नहीं कर पाते। इनको बहुधा यह भ्रम हो जाता है कि वह बहुत बड़े नेता या प्रभावशाली व्यक्ति हैं और समझाने पर भी इस बात को नहीं मानते है कि वास्तव में ऐसा नहीं है।

जोर-जोर से बातें करने लगते हैं, वे अत्याधिक खर्चे करने लगते हैं। रंग-बिरंगे और नये फैशन के कपड़े पहनना पसंद करने लगते हैं। अत्याधिक और धारा प्रवाह में बोलते हैं जिससे बहुधा इनकी बात भी समझना मुश्किल हो जाता है। यह शेरों-शायरी का भी प्रयोग करने लगते हैं।

उनकी नींद कम हो जाती है, बहधा रात को एक-दो घंटे ही सोते हैं और जब सुबह दो-तीन बजे उठ जाते हैं तो उसी समय से घर वालों को उठने के लिये उत्साहित करते हैं। ये एक स्थान पर स्थिर नहीं बैठ सकते, हमेशाचलते-फिरते रहते हैं। सड़क चलते लोगों से भी बातें करने लगते हैं। इनकी इच्छायें बढ़ जाती हैं और बिना सोचे-विचारे किसी से भी गलत व्यवहार कर सकते हैं। यदि इनको किसी भी कार्य करने से रोका जाये तो यह अत्याधिक क्रोधित हो जाते हैं और मार-पीट भी करने लगते हैं। भूख बढ़ जाती है परन्तु बहुधा ये इतनी उत्तेजना में रहते हैं कि इन्हें खाने का समय ही नहीं मिल पाता जिस वजह से यह लोग चिड़चिड़ाते रहते हैं।

मानसिक रोगों की उत्पत्ति के कारण

 डिप्रेशन रोग अधिकतर वंशानुक्रम के प्रभाव के कारण होता है। यह आवश्यक नहीं है कि रोगी के निकट संबंधियों में कोई इस रोग से पीड़ित हो लेकिन बहुधा इस प्रकार के रोग उनके संबंधियों में मिलते हैं। वंशानुक्रम के कारण इन रोगियों के मस्तिष्क में कुछ विशेष रसायन स्वतः घटते या बढ़ते रहते हैं। जब यह रसायन घटते हैं तो डिप्रेशन हो जाता है। कुछ समय पश्चात् यह रसायन स्वतः सामान्य भी हो जाते हैं। अतः यदि इस रोग की चिकित्सा भी न की जावे तो रोगी स्वयं सामान्य हो जाता है। यदि यह रसायन बढ़ जाते हैं तो मेनिया हो जाता है और यह भी कुछ समय पश्चात् स्वतः ठीक हो जाता है। कुछ रोगियों में यह रसायन केवल घटते ही हैं और बढ़ते नहीं हैं। ऐसे में बार-बार डिप्रेशन रोग होता रहता है।

मनोचिकित्सक से सलाह जरूरी

मेनिया के रोग वंशानुगत भी हो सकते हैं और स्वतः ठीक भी हो सकते हैं फिर भी निम्न कारणों से मनोचिकित्सक से सलाह लेना ही उचित है क्योंकि मेनिया का रोगी भी रोग होने के समय व्यर्थ के झगड़े- फसाद, फिजूल खर्ची इत्यादि के कारण स्वयं को एवं अपने संबंधियों को अत्याधिक नुकसान पहुँचा सकता है। इसलिये इन रोगियों की मनोचिकित्सक से समय पर चिकित्सा कराना या सलाह लेना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

3.स्किजोफ्रेनिया

इसमें मरीज के सोच विचार, मन और वास्तविक परिस्थिति को महसूस करने में अन्तर आता है। उन्हें कानों में आवाजें आती हैं, जिसके फलस्वरूप वे बुदबुदाते हैं, हँसते हैं या रोते हैं। लोगों पर, पत्नी पर या पड़ोसी पर शक करना, अपने आप में खोये रहना, घर से बाहर न निकलना। कुछ मरीज अधिक पूजा पाठ करते हैं या एकही स्थान पर घंटों खड़े रहते हैं, उन्हें नींद नहीं आती है तथा खाने-पीने, नहाने-धोने की सुध नहीं रहती है।

उपचार

इस रोग का उपचार मनोचिकित्सक की देखरेख में शीघ्र करवाना चाहिये। ऐसे रोगियों के इलाज में जरा भी लापरवाही नहीं होना चाहिये।

4.ऐंक्ज्याइटी (घबराहट)

इस रोग में रोगी को लगभग हर समय एक प्रकार की घबराहट बनी रहती है। विभिन्न प्रकार की चिंतायें और भय अनुभव होते रहते हैं, जैसे कुछ बुरा हो जायेगा या विपत्ति आ जायेगी। इस प्रकार की मानसिक स्थिति कई सप्ताह तक बनी रह सकती है। यदि यह लक्षण कुछ ही समय तक रहे तो इसे रोग की संज्ञा नहीं देना चाहिये। कभी-कभी यह बीमारी कुछ विषम परिस्थितियों में उत्पन्न हो जाती है, परन्तु यह बिना किसी विशेष परिस्थिति के भी उत्पन्न हो सकती है।

रोग के लक्षण

(1) घबराहट एवं बेचैनी (2) भविष्य के बारे में चिन्ता (3) नींद देर से आना अथवा बार-बार टूट जाना (4) ध्यान केन्द्रित करने में कठिनाई अनुभव करना (5) माँसपेशियों में तनाव होना जिसके कारण सिर दर्द अथवा शरीर के किसी भाग में दर्द अथवा कम्पन होना (6) दिल धड़कना (7) पेट में जलन सी महसूस होना (8) मुँह सूखना, इत्यादि ।

उपरोक्त लक्षण कम या ज्यादा मात्रा में हर समय बने रहते हैं, कभी घट जाते हैं और कभी बढ़ जाते हैं।

रोग का कारण :- यह रोग प्रायः उन व्यक्तियों को होता है जो बचपन से ही कुछ अपरिपक्व होते हैं और छोटी-छोटी बातों में घबरा जाते हैं। जब उन्हें कुछ विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है तब यह घबराहट लगातार बनी रहती है। कभी-कभी यह रोग स्थिर व्यक्तित्व के लोगों को भी हो सकता है यदि उन्हें बार- बार विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़े। कुछ दवाईयों के दुष्प्रभाव से भी यह बीमारी हो सकती है।

परिपक्व व्यक्तित्व वाले लोगों में जैसे ही विषम परिस्थिति समाप्त हो जाती है और रोग स्वतः समाप्त हो जाता है जबकि अपरिपक्व व्यक्तित्व वालों में परिस्थिति के अनुसार रोग घटता-बढ़ता रहता है और बहुधा एक दीर्घकालिक रूप ले लेता है।

उपचार :-

इस रोग की चिकित्सा में साइकोथैरेपी (मनोचिकित्सक परामर्श या काउंसिलिंग) मुख्य है

5.पेनिक डिसआर्डर

एकाएक घबराहट अक्सर उन लोगों को होती है जिन्हें ऐंक्ज्याइटी रोग है किन्तु कभी-कभी उन लोगों को भी होती है जिनमें पहले से ऐंक्ज्याइटी रोग न रहा हो। इसमें व्यक्ति एकाएक यह अनुभव करने लगता है कि वह अब बचेगा नहीं और उसे कुछ हो जायेगा। हाथ-पैर ठण्डे पड़ जाते हैं अत्याधिक पसीना आने लगता है और बहुधा ऐसे रोगियों को हार्ट अटैक का रोगी समझ लिया जाता है तथा उन्हें हृदय रोग विशेषज्ञ के पास ले जाया जाता है। यह अवस्था लगभग आधे घण्टे में स्वतः समाप्त हो जाती है। इस प्रकार की तीव्र घबराहट (पेनिक डिसआर्डर) कुछ रसायनों के एकाएक शरीर में बढ़ जाने के कारण होती है।

जाँच – यदि इस प्रकार के लक्षण पहली बार हों तो भ एक बार अच्छे चिकित्सक द्वारा जाँच करा लेना आवश्यक है, जिससे कोई विशेष शारीरिक रोग होने की सम्भावना को समाप्त किया जा सके। परन्तु हर बार इस प्रकार की घबराहट होने पर नये-नये चिकित्सक को : परामर्श करना अथवा बार-बार जाँच करने से कोई लाभ नहीं है। इस प्रकार की जाँचों से रोगी के मन में एक प्रकार का रोग भय उत्पन्न हो जाता है और वह पूर्णतया आत्म- विश्वास खो बैठता है। यह कभी-कभी इतना बढ़ जाता है कि रोगी अकेला घर से बाहर जाने में भी डरने लगता है और उसमें बाहर जाने का भय बन जाता है। इसलिये यदि तीव्र घबराहट के अटैक बार-बार हो रहे हों तब इस प्रकार के रोगी को कुछ विशेष प्रकार की औषधियाँ दी जाती हैं जिससे घबराहट होना बंद हो जाती है।

6.फोबिया (अकारण भय)

जब व्यक्ति किसी स्थान, परिस्थिति अथवा वस्तु से अकारण अत्याधिक भय अनुभव करने लगे तब इस मानसिक स्थिति को फोबिया कहते हैं। इन परिस्थितियों में साधारण व्यक्ति को इतना भय नहीं लगता। उदाहरणतया बंद जगह का भय, सफर करने का भय, घर से बाहर जाने का भय, ऊँचाई से भय, जन्तुओं से भय जैसे काकरोच, मकड़ी, छिपकली, चूहा इत्यादि।

रोग का प्रभाव – व्यक्ति को जिस वस्तु अथवा स्थिति से फोबिया होता है और उसे जब भी उस स्थिति या वस्तु के सम्पर्क में जाने की सम्भावना होती है तभी उसे घबराहट अनुभव होने लगती है। कभी-कभी यह घबराहट इतनी बढ़ जाती है कि व्यक्ति उस स्थिति से बचने का लगातार प्रयास करने लगता है। उदाहरणतया, किसी को यदि यात्रा का भय हो तो जैसे ही उसका कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम बनता है तभी से उसे घबराहट होने लगती है जो कि जाने के समय तक इतनी बढ़ जाती है कि बहुधा उसे अपने जाने का प्रोग्राम निरस्त कर देना पड़ता है। इस प्रकार फोबिया से ग्रसित व्यक्ति फोबिक स्थिति से बचने के प्रयास में अपने जीवन को संकुचित कर देते हैं।

इलाज

फोबिया की चिकित्सा के लिये औषधियाँ व सायकोथैरेपी दोनों का प्रयोग बहुत अधिक लाभदायक है और अधिकतर रोगी ठीक हो जाते हैं।

7.ओबसेशन (फालतू विचार)

इस रोग में व्यक्ति के दिमाग में कोई एक विचार बार-बार आता रहता है। वह यह जानता है कि यह विचार गलत है किन्तु तब भी वह उसे हटा नहीं पाता। उसे ऐसा लगता है कि अगर वह ऐसा नहीं सोचेगा तो कोई अनहोनी घटना या कुछ बुरा हो जायेगा। बहुधा यह विचार रोगी को कुछ विशेष कार्य भी बार-बार करने को बाध्य करते हैं और अगर वह यह कार्य न करे तो उसे बहुत उलझन व परेशानी होने लगती है। उदाहरण के लिये कई बार व्यक्ति को यह अनुभव होने लगता है कि उसके हाथ-पैर या कपड़ों में गंदगी लगी है और उसे बार-बार नहाना या सफाई करना पड़ता है लेकिन यह सब करने के उपरांत भी उसे शंका बनी रहती है कि

सफाई ढंग से नहीं हो पाई है। इस प्रकार से वह अपना सभी समय इन्हीं कार्यों अथवा विचारों में व्यतीत कर देता है जिससे ऐसे रोगियों का जीवन बहुत कष्ट मय हो जाता है। कई बार इन रोगियों के दिमाग में अप शब्द गंदे विचार या देवी-देवताओं के लिये अपमान जनक बातें आने लगती हैं। यद्यपि रोगी जानता है कि ये विचार पूर्णतया गलत हैं लेकिन ये विचार उसे बहुत अधिक परेशान कर देते हैं। ऐसे रोगी आत्महत्या की सोचने लगते हैं या कर बैठते हैं।

उपचार :- इस रोग की चिकित्सा में साइकोथैरेपी काफी प्रभावी होती है। साइकोथैरेपी के द्वारा शनैः-शनैः रोगी को अपने रोग के बारे में समुचित जानकारी देने के उपरांत उसके मानसिक तनाव को कम करने की प्रक्रिया समझाई जाती है तथा उसे सिखाया जाता है कि वह अपने विचारों तथा सोच के प्रति कैसा व्यवहार करे ताकि उसकी उलझनों व तनाव में कमी आ सके और उन पर वह धीरे-धीरे अपना नियंत्रण कर सके। तदोपरांत कुछ मनोवैज्ञानिक तरीकों द्वारा रोगी के व्यक्तित्व में कुछ परिवर्तन लाने का प्रयास भी किया जाता है जिससे कि वह इन विचारों से अपने आपको मुक्त कर सके। इस रोग में कुछ औषधियाँ दी जाती है जिनसे यदि रोगी पूर्णतया ठीक न भी हो सके तो भी उसका जीवन कुछ हद तक सामान्य हो जाता है।

8.हायपोकोन्ड्रियासिस (रोग भय)

कुछ रोगी शरीर के विभिन्न भागों में कमजोरी अथवा दर्द की शिकायत अक्सर करते रहते हैं अथवा वे अपने हृदय, पाचन क्रिया या श्वास क्रिया आदि के सुचारू रूप से न होने के बारे में सदैव आशंकित रहते हैं जबकि भली-भाँति परीक्षण करने पर भी उनके किसी अंग में कोई खराबी नहीं मिलती है। इस प्रकार के रोग को हायपोकोन्ड्रियासिस कहा जाता है।

रोग लक्षण :- यह रोगी निम्न में से किसी भी लक्षण को प्रदर्शित कर सकता है –

(1) हृदय रोग का भय – छाती में दर्द, दिल का धड़कना इत्यादि (2) श्वास क्रिया ठीक से न चलने का भय (3) माँस पेशियों में दर्द (4) सिर में दर्द (5) कमजोरी एवं वजन का न बढ़ना (6) चर्म संबंधी रोगों के होने की आशंका होना (7) पेट में दर्द रहना और पखाना ठीक से न होना।

ऐसे रोगी बार-बार चिकित्सा हेतु नये-नये डाक्टरों के पास जाते रहते हैं। प्रारम्भ में तो हर चिकित्सा से आराम मिलता है परन्तु कुछ समय पश्चात् रोग पुनः ही हो जाता है। इन रोगियों को यह दृढ़ विश्वास रहता है कि उन्हें कोई गम्भीर बीमारी है और डॉक्टर उसे समझ नहीं पाते हैं।

उपचार :- यदि इस रोग की चिकित्सा शीघ्र ही की जाये तब इसे ठीक किया जा सकता है। जब यह रोग बहुत समय तक बना रहता है तब इसके ठीक होने की सम्भावना कम हो जाती है। इस रोग की चिकित्सा में सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि रोगी की भली प्रकार जाँच करने पर जब यह स्पष्ट हो जाये कि उसे यह रोग है तब उसकी पुनः कोई जाँच नहीं करानी चाहिये और रोगी को स्पष्ट रूप से यह बता देना चाहिये की उसके शरीर के किसी अंग में कोई ऐसी खराबी नहीं है जिससे उसमें यह लक्षण उत्पन्न हो सके। इसके साथ-साथ यह भी बताना आवश्यक है कि जो लक्षण वह अनुभव कर रहा है वे झूठे अथवा बनावटी नहीं हैं, वह सभी लक्षण उसके लिये सत्य हैं लेकिन अपनी बीमारी के बारे में जो उसकी धारणा है उसे बदलने की आवश्यकता है।

इस रोग की चिकित्सा में सायकोथैरेपी ही दी जाती है जिसके अंतर्गत रोगी को यह विश्वास दिलाना कि उसे कोई शारीरिक रोग नहीं है एवं उसके सभी लक्षण मानसिक कारणों से उत्पन्न हैं। उसे अपने शरीर से ध्यान हटाकर दूसरे अन्य कार्य कलापों में रूचि लेने के लिये लगातार प्रोत्साहित किया जाता है.

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